पैगंबर हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की सीरत और इंसानियत के पैगाम को याद करने को लेकर मिलाद-उन-नबी ﷺ मुसलमानों के प्रमुख मजहबी मौकों में से एक है। इस मौके पर पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की विलादत-ए-बासआदत, आपकी पाकीजा जिंदगी, आला अखलाक, सीरत और इंसानियत के लिए दिए गए पैगाम को याद किया जाता है। मिलाद-उन-नबी ﷺ का मकसमिलाद-उन-नबी ﷺ क्यों मनाया जाता है? पैगंबर हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की सीरत और इंसानियत के पैगाम को याद करने को लेकर मिलाद-उन-नबी ﷺ मुसलमानों के प्रमुख मजहबी मौकों में से एक है। इस मौके पर पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की विलादत-ए-बासआदत, आपकी पाकीजा जिंदगी, आला अखलाक, सीरत और इंसानियत के लिए दिए गए पैगाम को याद किया जाता है। मिलाद-उन-नबी ﷺ का मकसद सिर्फ खुशी मनाना नहीं, बल्कि हुजूर-ए-अकरम ﷺ की सीरत और तालीमात को समझना तथा अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करना है। हुजूर ﷺ ने समाज में अमन, इंसाफ, बराबरी, भाईचारे, मोहब्बत, रहम और जरूरतमंदों की मदद का पैगाम दिया। सीरत-ए-नबी ﷺ से मिलती है जिंदगी की राह मिलाद के मौके पर कई जगह महफिल-ए-मिलाद, सीरत-ए-नबी ﷺ के कार्यक्रम, नात-ए-पाक, दरूद-ओ-सलाम और मजहबी जलसे आयोजित किए जाते हैं। उलेमा और खतीब हजरत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी और तालीमात के मुख्तलिफ पहलुओं पर रोशनी डालते हैं। आप ﷺ ने हमेशा सच्चाई, ईमानदारी, सब्र, इंसाफ और अच्छे अखलाक की तालीम दी। आपने गरीबों, यतीमों, मिस्कीनों और जरूरतमंदों की मदद करने तथा पड़ोसियों के हक अदा करने पर जोर दिया। इंसानियत, अमन और भाईचारे का पैगाम मिलाद-उन-नबी ﷺ के मौके पर लोगों को यह पैगाम दिया जाता है कि समाज में नफरत और भेदभाव के बजाय मोहब्बत, अमन, भाईचारा और इंसानियत को बढ़ावा दिया जाए। जरूरतमंदों की मदद की जाए और हर इंसान के साथ अच्छे अखलाक से पेश आया जाए। कई जगह इस मौके पर गरीबों और जरूरतमंदों के बीच खाना, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें भी तकसीम की जाती हैं। इन सामाजिक और फलाही कामों के जरिए पैगंबर हजरत मुहम्मद ﷺ की इंसानियत और रहमदिली की तालीम को आम करने की कोशिश की जाती है। 12 रबीउल अव्वल का क्या महत्व है? आम तौर पर 12 रबीउल अव्वल को हुजूर-ए-अकरम हजरत मुहम्मद ﷺ की विलादत से जोड़ा जाता है। हालांकि आपकी विलादत की मुकम्मल तारीख को लेकर उलेमा और मुहर्रिखीन के बीच मुख्तलिफ राय पाई जाती है। इसी तरह मिलाद मनाने के तरीके और इसकी मजहबी हैसियत को लेकर भी मुख्तलिफ मकातिब-ए-फिक्र के बीच अलग-अलग राय मौजूद है। आज के दौर में मिलाद का पैगाम आज जब समाज में नफरत, हिंसा और आपसी दूरी जैसी चुनौतियां दिखाई देती हैं, ऐसे में सीरत-ए-नबी ﷺ से अमन, सब्र, इंसाफ, मोहब्बत और इंसानियत का पैगाम लिया जा सकता है। मिलाद-उन-नबी ﷺ हमें यह याद दिलाता है कि हुजूर हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की जिंदगी सिर्फ मुसलमानों के लिए मजहबी रहनुमाई का जरिया नहीं, बल्कि अच्छे अखलाक, इंसाफ, रहम और इंसानियत की मिसाल भी है।द सिर्फ खुशी मनाना नहीं, बल्कि हुजूर-ए-अकरम ﷺ की सीरत और तालीमात को समझना तथा अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करना है। हुजूर ﷺ ने समाज में अमन, इंसाफ, बराबरी, भाईचारे, मोहब्बत, रहम और जरूरतमंदों की मदद का पैगाम दिया।
सीरत-ए-नबी ﷺ से मिलती है जिंदगी की राह
मिलाद के मौके पर कई जगह महफिल-ए-मिलाद, सीरत-ए-नबी ﷺ के कार्यक्रम, नात-ए-पाक, दरूद-ओ-सलाम और मजहबी जलसे आयोजित किए जाते हैं। उलेमा और खतीब हजरत मुहम्मद ﷺ की जिंदगी और तालीमात के मुख्तलिफ पहलुओं पर रोशनी डालते हैं। आप ﷺ ने हमेशा सच्चाई, ईमानदारी, सब्र, इंसाफ और अच्छे अखलाक की तालीम दी। आपने गरीबों, यतीमों, मिस्कीनों और जरूरतमंदों की मदद करने तथा पड़ोसियों के हक अदा करने पर जोर दिया। इंसानियत, अमन और भाईचारे का पैगाम मिलाद-उन-नबी ﷺ के मौके पर लोगों को यह पैगाम दिया जाता है कि समाज में नफरत और भेदभाव के बजाय मोहब्बत, अमन, भाईचारा और इंसानियत को बढ़ावा दिया जाए। जरूरतमंदों की मदद की जाए और हर इंसान के साथ अच्छे अखलाक से पेश आया जाए। कई जगह इस मौके पर गरीबों और जरूरतमंदों के बीच खाना, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें भी तकसीम की जाती हैं। इन सामाजिक और फलाही कामों के जरिए पैगंबर हजरत मुहम्मद ﷺ की इंसानियत और रहमदिली की तालीम को आम करने की कोशिश की जाती है। 12 रबीउल अव्वल का क्या महत्व है? आम तौर पर 12 रबीउल अव्वल को हुजूर-ए-अकरम हजरत मुहम्मद ﷺ की विलादत से जोड़ा जाता है। हालांकि आपकी विलादत की मुकम्मल तारीख को लेकर उलेमा और मुहर्रिखीन के बीच मुख्तलिफ राय पाई जाती है। इसी तरह मिलाद मनाने के तरीके और इसकी मजहबी हैसियत को लेकर भी मुख्तलिफ मकातिब-ए-फिक्र के बीच अलग-अलग राय मौजूद है। आज के दौर में मिलाद का पैगाम आज जब समाज में नफरत, हिंसा और आपसी दूरी जैसी चुनौतियां दिखाई देती हैं, ऐसे में सीरत-ए-नबी ﷺ से अमन, सब्र, इंसाफ, मोहब्बत और इंसानियत का पैगाम लिया जा सकता है। मिलाद-उन-नबी ﷺ हमें यह याद दिलाता है कि हुजूर हजरत मुहम्मद मुस्तफा ﷺ की जिंदगी सिर्फ मुसलमानों के लिए मजहबी रहनुमाई का जरिया नहीं, बल्कि अच्छे अखलाक, इंसाफ, रहम और इंसानियत की मिसाल भी है।