सत्ता किसी की भी हो—जब तक पत्रकार उसके सुर में सुर मिलाए, वह 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहलाता है; लेकिन जैसे ही वह जनता के हक में तीखे सवाल दागने लगे, वह हुकूमत की 'आंखों की किरकिरी' बन जाता है।
सियासत का दस्तूर बड़ा अजीब है। विपक्ष में बैठे नेता जिस पत्रकार की पीठ थपथपाते हैं, वही नेता कुर्सी मिलते ही उसी पत्रकार की कलम पर पहरा बैठाने लगते हैं। *चेहरे बदलते हैं, झंडे बदलते हैं, लेकिन सच से डरने का सत्ता का मिजाज कभी नहीं बदलता।*
न प्रलोभन में बिकना, न सत्ता के रसूख से डरना—यही सच्ची पत्रकारिता की कीमत रही है। 90 के दशक के उस दौर से लेकर आज तक, जब न डिजिटल सुरक्षा थी और न समर्थन का कोई डिजिटल शोर, पत्रकारों ने कैसे जान की बाजी लगाकर सच को जिंदा रखा?
शुरू कर रहे हैं एक खास दास्तान—' *सच की कीमत'। जानिए कैसे* *खतरे की धार पर चलकर असली पत्रकारिता होती है।"*
सत्ता किसी की भी हो—जब तक पत्रकार उसके सुर में सुर मिलाए, वह 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहलाता है;